the third eye

That it looks unlikely that both eyes

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tejwanig


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साईं बाबा विवाद पर छिड़ी है वैचारिक जंग

Posted On: 3 Jul, 2014  
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Religious में

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मोदी के ही कब्जे में ही रहेगा भाजपा संगठन भी

Posted On: 11 Jun, 2014  
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Politics में

349 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Невероятно, так здорово повторяют! Особенно смешная болоночка (так мне показалось) – ТАКИМ низким, мужским голосом ѵÂазговариЀ²ÃÂ°ÃÂÂт. А котик – бедный, мокрый, несчастный – а его заставляют говорить:”I lave you!”Ирина, спасибо, похохотала вволю!

के द्वारा:

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शंकराचार्य जी महाराज ने तो छोड़ दी एक फुरफुरी | लोगों को मसाला मिल गया चुस्की लेने का । अब दिन रात अपना लक्ष्य छोड़कर इसपर ही टीका-टिप्पणी, तर्क-कुतर्क, थुक्का-फ़जीहत और तू-तू, मैं-मैं होती रहेगी बस | राजनीति करने वालों ने इसको वोट बैंक मानकर अपनी दखल देना शुरू कर दिया । मीडिया को अपना टी आर पी बढ़ाने का मसाला मिल गया । इस मसले में दखल देकर संत समाज को अपना कद और भी ऊँचा करने का अवसर मिल गया । आज देखा जाये तो दो बातों का बोलबाला है - आदमी अधिक दिख रहे हैं तो राजनीतिक मोड़, और माया की बात आती है तो भौतिकवादी दौड़ । और फिर अपना-अपना कद एक-दूसरे से लम्बा करने की होड़ । इसमें भगवान् , संत और संतई कहाँ है ? इस नाज़ुक दौर में क्या अपनी एनर्जी इस प्रकार से व्यर्थ में लगनी चाहिए ? मनन करें.... भगवान आस्था से हैं | भगवान का रूप, रंग भक्त की आस्था से बनता है | प्रपंच से अलग साधु, संत, सूफी, पीर, कलंदर आदि सबने इश्क़, प्रेम, मोहब्बत आदि को भगवान से जोड़ा है | जिस रूप में भक्त ने भगवान् को पूजा है, इश्क़ और मोहब्बत की है । उस में भगवान को आना पड़ा है। प्रेम का जितना अधिक पारावार भक्ति रस से प्रभु के प्रति चढ़ेगा, उतना अधिक ही प्रभु का सानिध्य भक्त को मिलेगा | भक्त और भगवान में तो आशिक़ और माशूक का रिश्ता है । फिर जिस रूप रंग में वो चाहेगा भगवान को उसमे आना ही पड़ेगा | भगवान तो भाव और भावना के भूखे हैं जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तीन तैसी अब आशिक़ और माशूक़ के बीच कोई तीसरा क्यू ... ये गोपाल राजू के अपने विचार हैं, सब कोई इससे सहमत हो, ये ज़रूरी नहीं । www.gopalrajuarticles.webs.com

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के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: tejwanig tejwanig

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शायद ही कोई ऐसा दिन हो, जब कि देश के किसी मुद्दे के बाल की खाल न उधेड़ी जाती हो। हर रोज कुछ न कुछ छीलने को चाहिए। अब किसी पार्टी या नेता को अपना मन्तव्य अलग से जाहिर करने की जरूरत ही नहीं होती, खुद न्यूज चैनल वाले ही उन्हें अपने स्टूडियो में बुलवा लेते हैं। हर चैनल पर राजनीतिक पार्टियों के नेताओं, वरिष्ठ पत्रकारों व विषय विशेषज्ञों का पैनल बना हुआ है। इसी के मद्देनजर पार्टियों ने भी अपने प्रवक्ताओं को अलग-अलग चैनल के लिए नियुक्त किया हुआ है, जो रोजाना हर नए विषय पर बोलने को आतुर होते हैं। अपनी बात को बेशर्मी के साथ सही ठहराने के लिए वे ऐसे बहस करते हैं, मानों तर्क-कुतर्क के बीच कोई रेखा ही नहीं है।बिलकुल सत्य ! व्यावहारिक पोस्ट श्री तेजवानी जी

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

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आदरणीय तेजवानी जी, सादर ! बिलकुल ठीक कहा है आपने ! दिल्ली में अनशन पर बैठे उन दो बहादुर नागरिकों के सम्बन्ध में देश जान्ने को उत्सुक है, पर उसके लिए मीडिया को फुर्सत नहीं, पर निदा फाजली ने अमिताभ को क्या कहा यह हर चैनल बता रहा है ! हद है !!! सलमान खुर्शीद के घपले का क्या हुआ, गडकरी के घपले का क्या हुआ, राबर्ट बढेरा के घपले का क्या हुआ, सिंचाई घोटाले का क्या हुआ, खेल घोटाले का क्या हुआ, टू-जी घोटाले का क्या हुआ, खनिज घोटाले का क्या हुआ, इन सब के सम्बन्ध में बहस करने की, समाचार दिखाने की किसी को फुर्सत नहीं, पर "बिग बॉस" में कौन विजेता बनी, यह दिखाने की फुर्सत है ! हद है !!! अब तो लग रहा है की भारत का भविष्य मीडिया ही खराब करेगा ! सादर !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

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मगर अब जब कि सोनिया थक चुकी हैं और राहुल को आगे लाना चाहती हैं, जो कि कांग्रेस की मजबूरी भी है, राहुल के प्रति कहीं क्रेज नजर नहीं आता। विशेष रूप से उत्तरप्रदेश के चुनाव की कमान अपने हाथ में लेने के बाद भी जब कांग्रेस नहीं उबर पाई तो सर्वत्र यही चर्चा होने लगी कि राहुल में चमत्कार जैसी कोई बात नहीं, जिसके बूते कांग्रेस की वैतरणी इस बार पार हो पाए। इसके अतिरिक्त लगातार बड़े-बड़े घोटाले उजागर होने, भ्रष्टाचार, महंगाई और अन्ना हजारे -बाबा रामदेव की मुहिम के चलते कांग्रेस की हालत पहले के मुकाबले बेहद खराब है। आपको ऐसा नहीं लगता की राहुल अगर राजीव गाँधी के बेटे न होते तो शायद कहीं , कांग्रेस के दफ्तर में झाड़ू मार रहे होते ? असल में हमारे यहाँ दो तरह की मानसिकता हर क्षेत्र में काम करती है ! एक भगवान् वो होता है जो सर्वविदित है , और एक वो जो लोगों द्वारा जबर्दास्यती बनाया जाता है , जैसे कालिदास ! राहुल दूसरी केटेगरी में आते हैं !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

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ऐसा नहीं कि सिंह अकेले ऐसे अफसर हैं, जो सेवानिवृत्ति के बाद खुल कर सरकार के खिलाफ खड़े हैं। पहले भी कई अफसर इस प्रकार की हरकतें कर चुके हैं। खैरनार जैसे कम ही अफसर रहे हैं जो ईमानदारी को जिंदा रखने के लिए नौकरी पर रहते हुए सरकारों से टकराव ले चुके हैं। इस सिलसिले में अरविंद केजरीवाल जरूर समर्थन के हकदार हैं, जिन्होंने समाजसेवा व देश सेवा की खातिर अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी, यह बात दीगर है कि उसमें भी उन्होंने नियम-कायदों को ताक पर रख दिया। बाद में कलई खुली तो बड़ा अहसान जताते हुए बकाया चुकाने को राजी हुए। एक कवी हैं श्री रमेश मुस्कान जी , उनकी पंक्तियाँ लिख रहा हूँ क्या करें बैठे ठाले , चल कर लेते हैं घोटाले !! घोटाले तो ये नहीं कर रहे किन्तु रिटायर्मेंट की जिंदगी को विअभाव्शाली बनाये रखने के लिए कुछ कर लिया जाये , यही सोच है ! आपसे सहमत हूँ की यदि इतनी ही देश भक्ति दिखानी थी तो नोकरी से इस्तीफा देकर मैदान में आना चाहिए था !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

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आदरणीय तेजवानी जी, सादर ! भाजपा का ढुलमुल रवैया ही उसे सबसे ज्यादा नुकसान पंहुचा रहा है ! जनता के सामने ज्यों ही कोई अन्य विकल्प, जो त्वरित कारवाई करने की चाह रखता हो, और अपने क्रिया-कलापों से उसे सिद्ध भी कर रहा हो, मिल जाय, तो जनता उसे हाथो-हाथ लेगी ! वादों और आश्वासनों का दौर बहुत चला, ऊबन हो गई है ! पता नहीं भाजपा के महारथी देश की नब्ज को क्यों नहीं समझ पा रहे हैं ! दिखावे की राजनीति कितने दिन चलेगी ! हवा का रुख अगर ये नहीं समझे, और वादों और आश्वासनों की लीक पर ही चलते रहेंगे तो इसका खामियाजा उन्हें ही भुगतना पडेगा ! आनेवाले विधान सभा चुनावों में इन्हें बहुत कठिनाई का सामना करना पडेगा ! कुशल राजनितिक पार्टी को तत्काल देश की जनता की दशा और दिशा को समझने की क्षमता होनी चाहिए ! अन्ना के आन्दोलन के सुप्तप्राय होने का दुःख बहुत लोगों को है ! जनता के दिल में एक हूक सी उठती है ! केजरीवाल जी के रास्ते थोड़े भिन्न हैं, पर जनता के मनोनुकूल हैं ! मैं ह्रदय से उनकी सफलता की कामना करता हूँ ! ऐसे साहसी व्यक्ति के प्रति भी जिसके मन में संदेह के भाव हैं, और जो कहते हैं की वे अपनी राजनितिक महत्वाकांक्षा की पूर्ती कर रहे हैं, वे यह भूल जाते हैं की अपने घर में बैठ कर इन बातों का विश्लेषण करने में और जान हथेली पर लेकर मैदान में ललकारने में अंतर होता है ! अगर हम ऐसा नहीं कर सकते तो जो ऐसा कर रहा है उसे सपोर्ट तो कर कर सकते हैं ! आभार !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

Tejwanig जी, मेरी जानकारी के अनुसार संभवतः आप पत्रकार हैं किन्तु इस लेख में आपने जो दो बिंदु जोड़ने का प्रयास किया है वह अपरिपक्व है.! फेसबुक पर इस तरह की तस्वीर डालने वाला भाजपाई है ऐसा आपने मान लिया, प्रथम दृष्टया ऐसा कहा भी जा सकता है| किन्तु हर हिंदूवादी भाजपाई नहीं है, विशेष रूप से फेसबुक पर! दूसरा भाजपा के वोटर अथवा supporter की फेसबुक पोस्ट्स से आप एक राष्ट्रीय पार्टी की स्थिति अथवा चरित्र विश्लेषण करने लग जाएँ तो दो बाते लगती हैं, या तो आप राष्ट्रीय राजनीती को समझने में जल्दबाजी कर गए अथवा फेसबुक को पुरानी पारंपरिक सोच से समझने का प्रयास करते है.! आपके आशय का मैं विरोध नहीं करता क्योंकि निश्चित रूप से भाजपा केजरीवाल को लेकर मुश्किल में है, लेख के अंत में आपके द्वारा दिए गए विश्लेषण से काफी हद तक सहमत हूँ| किन्तु जहाँ से आपने लेख का प्रारंभ किया, वैसा कुछ प्राथमिक विचार दिमाग में तो बनाया जा सकता है लेकिन लेख उस आधार पर नहीं लिखा जा सकता, विशेषकर एक पत्रकार द्वारा!

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देश के उद्धार के लिए दूसरे गांधी के रूप में उभरे अन्ना के आंदोलन को राजनीतिक दिशा किसने दी, इस पर भी दोनों के बीच मतभेद हैं। केजरीवाल का कहना है कि पार्टी बनाने का निर्णय उनका नहीं बल्कि अन्ना हजारे का था। केजरीवाल का कहना है कि पुण्य प्रसून वाजपेयी से बैठक के बाद अन्ना ने राजनीतिक दल बनाने का निर्णय ले लिया था। उन्होंने उसका नाम भी तय कर लिया था-भ्रष्टाचार मुक्त भारत। केजरीवाल का ये कहना है कि अन्ना ने राजनीतिक दल बनाने का मन बनाने के बाद मुझसे पूछा था कि मैं क्या सोचता हूं इस बारे में। यह मेरे लिए चौंकाने वाली बात थी इसलिए मैंने अन्ना से सोचने के लिए थोड़ा समय मांगा था। बाद में मैं भी उनके विचार से सहमत हो गया। पार्टी बनाने पर राय लेने के लिए सर्वेक्षण करवाने का विचार अन्ना हजारे ने स्वयं ही दिया था। दूसरी ओर अन्ना कह रहे हैं कि राजनीति के रास्ते जाने वाला ग्रुप बार बार ये कहता था कि अन्ना कहें तो हम पक्ष और पार्टी नहीं बनायेंगे, लेकिन मेरे पार्टी नहीं बनाने के निर्णय के बावजूद उन्होंने पार्टी बनाने का फैसला लिया। उन्होंने इस बात का भी खंडन किया कि उन्होंने पार्टी बनाने को कहा था। स्पष्ट रूप से सहमत हूँ

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

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भारत में एक सहज और सुग्राह्य संपर्क भाषा का होना अति आवश्यक है और इस भूमिका में तो हिंदी को ही रखना श्रेयष्कर होगा। हिंदी के प्रचार में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महाराष्ट्र के काका कालेलकर ने हिंदी में संपर्क भाषा के सभी गुण देखे थे। उनका कहना रहा कि हिंदी माध्यम स्वदेशी है। करोड़ों भारतवासियों की जनभाषा हिंदी ही है। दूसरा कारण यह है कि सब प्रांतों के संत कवियों ने सदियों से हिंदी को अपनाया है। यात्रा के लिए जब लोग जाते हैं तो हिंदी का ही सहारा लेते हैं। परदेशी लोग जब भारत भ्रमण करते हैं तब उन्होंने देख लिया कि हिंदी के ही सहारे वे इस देश को पहचान सकते हैं। आदरणीय तेजवानी जी, नमस्कार! ब्लॉग की सुन्दरता ,सटीकता और आपका 'बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक के रूप में चयन के लिए हार्दिक बधाई.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय गिरधर जी, आपका कथन एकदम सही है किसी मानसिक रूप से विक्षिप्त को भगत सिंह का दर्जा नहीं दिया जा सकता असीम का क्रोध तो समझ में आ सकता है और उसकी देश भक्ति तथा उसके संगी साथियों की देश भक्ति कैसी है यह समझना शायद आसान नहीं होगा ? असीम कोई अकेला कार्टूनिस्ट नहीं है देश में इससे पहले बहुत महान कार्टूनिस्ट अभी देश में जीवित भी है लेकिन मेरे विचार किसी और ने आजतक राष्ट्रीय प्रतीकों के साथ ऐसा भद्दा मजाक नहीं किया है - शायद यह उसके बेरोजगार होने की ही मानसिकता है जिसने उसे ऐसा करेने के लिए उसकाया है इस लिए उसके लिए पुनर्वास की आवश्यकता तो हो सकती है जेल नहीं ? क्योंकि उसके साथियों की भी मानसिकता यही है की किसी प्रकार से उन्हें जेल भेज दिया जाय जिस कारन वह हीरो बन जाय और आने वाले चुनाव में अपना भाग्य अजमाए .

के द्वारा:

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तेजवानी गिरधर जी सबसे पहले सप्ताह का बेस्ट ब्लागर चुने जाने के लिए बधाई .हिंदी को हिंदी दिवस के दिन याद किया जाना ही हिंदी की प्राथमिकता आज देश में कितनी है इसको जाहिर करता है भले सन १९४९ में इसे देश की मातृभासा और प्रमुख संपर्क भासा का दर्जा संविधान द्वारा दिया गया पर देशवासियों ने खासकर जो लोग अपने को विद्वान् कहते है, वे हिंदी बोलना अपने सम्मान के खिलाफ समझते हैं और जो कोई उनसे हिंदी में संपर्क करता है उसे वे अनपढ़- गवार ही समझते हैं और अंग्रेजी बोलना अपनी शान समझते हैं , हलाकि सच्चाई यही है की अभी भी अंग्रेजी बोलने ,समझने और लिखने वालों की संख्या हिंदी जानने वालों से कम हीं है पर वे बहुमत पर अल्पमत होने के बावजूद भी हावी हैं और हिंदी बोलने वाले को सम्मान देना तो दूर उसे धिक्कारना ज्यादा मुनासिब समझते हैं और इसीमे अपनी शान भी समझते हैं खासकर दक्छिन भारत के लोग हिंदी को अब भी राष्ट्रभासा मानने के लिए तैयार नहीं यह अपने देश का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है और हमारी गुलामी का प्रतीक है दो सौ साल अंग्रेज यहाँ राज क्या किये, यहाँ के लोगों को उनकी भाषा का गुलाम बना गए, वो तो भला हो हिंदी पत्र पत्रिकाओं का जो अपने प्रयास से इसे अब भी जिन्दा रखे हुए हैं और आशा की जा सकती है की भविष्य में हिंदी को अपनी पहचान जरुर मिलेगी इस उत्तम कार्य में हिदी टेलीविजन चैनल भी बहुत मदद कर रहें हैं और वे बधाई के पात्र हैं अतः अंत में मैं यही कहूँगा हमें हर हाल में आशावान रहना है अपने तईं अपनी मातृभासा को कैसे गौरव प्राप्त हो इसका प्रयास करना है एक उत्तम लेख लिखने के लिए आपको धन्यवाद

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

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तेजवानी जी, एक आप हैं कि इतने दिनों से महान लेख लिखते हुए भी जहां के तहां ही हैं, मिर्ची लगने की तरह जलन होना तो स्वाभाविक ही है ।   राष्ट्रीय प्रतीकों से खिलवाड़ क्षम्य नहीं होना चाहिये, किन्तु यदि राष्ट्र के साथ खिलवाड़ किया जा रहा हो तब? राष्ट्र अधिक महत्वपूर्ण है या राष्ट्र का प्रतीक चिन्ह?   भारत माता को डायन कहने वाला आज सरकार में मंत्री है ,इस माननीय पर कोई मामला नहीं बनता है?  सर्वाधिक महत्वपूर्ण रार्ष्ट्रीय प्रतीक तिरंगा झण्डा को थोड़ा सा बदल कर अपना झण्डा बना कर कांग्रेस कई वर्षों से अपना राजनीति का करोबार कर रही है और देश के संसाधनों को बेच माल स्विस बैंको मे भर रही  है,वो देशद्रोह नहीं है ,स्वीकार्य है किन्तु अशोक की लाट की तरह कार्टून बना भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करना  अक्षम्य है?    यदि ये देशद्रोह है तो हमे देशद्रोही कहलाने मे गर्व  ही होगा। (भले ही आप हम पर तरस करें)

के द्वारा: ajaykumarsingh ajaykumarsingh

तेजवानी साब जब तक संघ है तब तक मोदी को चिंता की आवश्यकता नहीं है , रही बात जिस बयान को लेकर ये कहा गया की संघ भी नितीश की तारीफ कर रहा है वो मीडिया की दें थी.. भागवत जी ने कहा था की बिहार में भी खूब उन्नति हो रही है , कुछ मामलो में तो वो गुजरात से भी तेज है . ये एक औपचारिक बात होती है .. इससे ऐसा कुछ भी प्रतीत नहीं होता की संघ किसी भी तरह मोदी के खिलाफ है ... और भाजपा में केवल संघ की चलती है ... और भाजपा और संघ को जो भी अन्दर से जानता है उन सबको पता है की ये दोनों गुजरात चुनाव का इंतज़ार कर रहे है .. क्योकि यदि मोदी चुनाव जीतते है तो उन्हें उस जश्न के माहौल में स्वीकार करना आसान रहेगा और जो नहीं स्वीकार करेंगे.. उन्हें छोड़ दिया जायेगा ... पर यदि किसी तरीके से मोदी हार जाते है तो भाजपा के पास कहने को मुह रहेगा की हमारे पास प्रधानमंत्री के उम्मेद्वारो की कमी नहीं है ..

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

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भाजपा की सफेद झग कमीज पर दाग़....  जिस भाजपा की पीठ पर सवार हो टीम अन्ना ने अपना कद ऊंचा किया।  वाह आपने वो देख लिया जो कोई न देख पाया। बंगारू लक्षमण अभी भी जेल में अपनी सफेद झग कमीज पर भूल वश लगे दाग़ को धो रहे हैं लेकिन कोई उन्हे बढ़िया वाशिंग पाउडर ही नहीं दे रहा है। आप भाजपा के लिये दाग़ अच्छे हैं कह सकते हैं।भाजपा प्रदेश में खनन माफिया द्वारा एक अधिकारी को दिन दहाड़े कुचल कर मार दिया जाता है और ग़रीब ड्राइवर पर आरोप लगा दिया जाता है लेकिन उनकी कमीज सफेद झग है।    वैसे आप के लेख पर अधिक लिखना बेकार है, आप वही कर रहे हैं जिसकी आप ने ठान रखी है कि जैसे भी हो केजरीवाल का मान मर्दन करना। मुझे जो कहना था ,अपने ब्लाग में लिख चुका हूँ। http://ajaykumarsingh.jagranjunction.com/2012/08/26/%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%88/

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तेजवानी जी, मुझे लगता है कि यह आशंका निराधार है कि अरविन्द सोसायटी काँग्रेस से मिली हुई है, क्योंकि प्रशांत एवं शांति भूषण काँग्रेस एवं गाँधी परिवार  के कट्टर दुश्मन हैं। 1975 में इन्हीं वजह से सत्ता से पदच्युत होने के भय से  इन्दिरा जी को आपातकाल लगाना पड़ा था जिसके कारण 1977 में करारी पराजय झेलना पड़ी थी। हाँ आन्दोलन के प्रारंभिक दौर में जरूर इनकी कामेटी में कुछ काँग्रेस एवं कुछ भाजपा के एजेन्ट शामिल थे। इनमें से एक थे स्वामी अग्निवेश जी, जिनकी पोल खुल गई थी। चँकि काँग्रेस के दाग बहुत अधिक मटमैले एवं काले हैं इसलिये जनता को स्पष्ट नजर  आ जाते हैं किन्तु भाजपा के दाग उनके कपड़ों के रंग के हैं, जो प्रथम दृष्टि में नजर नहीं आते। लेकिन यह सच है कि यदि अरविन्द केजरीवाल सफल रहे तो यह सच है कि इन  सब नेताओं के लिये एक अलग तरह की जेल बनवाना पड़ेगी। जो दिखने में संसद की तरह होगी। शायद ही कोई नेता जेल जाने से बच जाय। केजरीवाल का जन्म राजनीति के पतित होने के कारण हुआ है।

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तेजवानीभाई सच तो हमेशा एक ही होत है लेकिन केजरीवालने दो दो तीन तीन सच सामने रख दिये । १ या तो वो साफ है २ या तो वो साफ नही ३ या मिले जुले । १ के कारण मैं अन्ना को समर्थन करता था । मुंबई के एक समय के हिरो खैरनार की बातों पर भरोसा नही करता था । उन की और अन्ना की अंदरूनी बातें नजर अंदाज कर दी थी । अब लगता है की खैरनार साहब सही कहते थे । २ नंबर ही है । ९ तारिख को रामदेव अपनी पार्टि का नाम घोषित करे ईस से पहले अचानक अपनी पार्टी घोषित कर दी । कोंग्रेस को जनमत से कोइ मतलब नही । आधी प्रजा तो खरीद के रख्खी है । भाजप को दूर रखने के लिए ही अन्ना को खडा किया है । अन्ना की हैसियत नही की खूद की सरकार बना ले । अन्नापार्टि के सपोर्ट से कोंग्रेस सरकार बनेगी । बहाना आयेगा धर्मनिर्पेक्षता का ।

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तेजवानी जी, नमस्कार,    अन्ना जी के ब्लाग को यहां प्रस्तुत करने के लिये हार्दिक धन्यवाद। वास्तव में भले ही कुछ लोगों ने इसे मात्र अरविन्द केजरीवाल का ही आन्दोलन समझा हो किन्तु ये आन्दोलन पूरी तरह संगठन द्वारा ही संचालित था। किरनबेदी अवश्य भाजपायी नेताओं के घेराव से असहमत थीं और आन्दोलन में कहीं दिखाई नही दीं किन्तु उन्होने कहीं विरोध भी नही किया। इस आन्दोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यही थी कि अन्ना जी के व्यक्तिगत अनुपस्थित में भी यह प्रभावपूर्ण रहा, और आज का आन्दोलन एक साथ कई स्थानों पर हुआ और  सफल रहा भले ही वहां अरविन्द केजरीवाल भी न रहे हों।अन्ना जी का आशीर्वाद तो महत्वपूर्ण है ही किन्तु अरविन्द जी का युवा नेतृत्व यदि आन्दोलन को इतनी सफलता पूर्वक आगे बढ़ाने मे सफल रहते हैं तो यह शुभ संकेत ही है।

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प्रिय तेजवानी जी प्रणाम, आधुनिक स्वयंभू सन्यासी,/ महान योग गुरु /वेदाचार्य /राज्नितिकाचार्य/स्वामी राम देव उर्फ़ रामसेवक यादव, में गजब की आत्मिक शक्ति तो है जो उनको सरकार से पंगा लेने को प्रोत्साहित करती है राजनीती के कीटाणु तो उनके अंदर तभी से पैदा हो गए थे जब उनके योग शिवरों में बड़े बड़े राजनितिक लोग उनकी चरण वंदना करते थे - लेकिन अचानक यह क्या हो गया की अपनी पार्टी की घोषणा से पहले ही इन्द्रप्रस्थ के राम लीला के मैदान में हथियार छोड़ दिए ? क्या यह काले धन के विरुद्ध युद्धघोष करने वाले का राजनीती की ओर पलायन था या अपनी काली संपत्ति को सरकारी सिकंजे से बचाने की कवायद भर थी अब यह तो आने वाला समय ही बता पायेगा / लेकिन जिस प्रकार भारतीय जन मानस भ्रष्टाचार और काले धन के विरूद्ध गोल बंद किया था वह मासूम जनता ठगी सी रह गई है ? आपके सुन्दर लेख के लिए बधाई

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महाशय यदि रामदेव जी की अपार धन सम्पदा इमानदारी का कमाई से नहीं आयी लगती है तो कुछ बेइमानी वाले तथ्यों पर भी प्रकाश डालते। उन्होने कृपा भेजने के नाम लोगों को ठगा नहीं है वरन भारतीय योग ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने का कार्य़ किया है और लोगों ने यथा शक्ति चंदा आदि से उन्हे धनवान बनाया है। उनका संघर्ष प्रशंसनीय है किन्तु यह सत्य है कि उन्होने विपक्षी राजनेताओं को मंच पर बुला कर या उनका समर्थन लेकर या उन पर भरोसा कर के भारी भूल की है।  भ्रष्टाचार के विरूद्ध वर्तमान पक्ष विपक्ष कोई राजनेता इमानदारी के साथ नहीं है। एक चोर को विकल्प दूसरा चोर नहीं हो सकता।       एक ही विकल्प है वह है एक नया दल जो जनता द्वारा जनता के लिये बने।

के द्वारा: ajaykumarsingh ajaykumarsingh

तेजवानी जी, नमस्कार! मैं आपके द्वारा दिए गए तथ्य एवं तर्कपूर्ण विचारों का विरोध नहीं करता, पर क्या हम इसी तरह अपने हालत पर रोते रहेंगे? जो हो रहा है वह क्या उचित है? क्या हम सब ऐसे ही अपने विचार लिखकर संतुष्ट हो जायेंगे. क्या इस देश में सुधर की आवश्यकता नहीं है? अगर सत्ता परिवर्तन का डर नहीं होगा तो ये ऐसे ही घोटाले पर घोटाले करते रहेंगे और हम महंगाई, भुखमरी, बेरोजगारी का रोना रोते रहेंगे? कुछ तो उपाय करने ही होंगे जिससे वर्तमान परिस्थति में थोडा तो सुधार आए. बाबा और अन्ना दोनों ही परस्त हो गए लगते हैं अब तो अगर विरोधी दल आपस में मिलें तभी कुछ आश जगे या फिर तो जैसे हैं ... मोबाइल, कम्पूटर, इन्टरनेट, कुछ भी बोलने या करने की आजादी और क्या चाहिए ... !!!!!!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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तेजवानी जी, सादर नमस्कार। मेरा मानना है कि  15 अगस्त 1947 को काँग्रेस और अंग्रेजों के मध्य सत्ता के हस्तान्तरण का समझौता हुथा था। अंग्रेजों ने यह समझौता अपनी शर्तों पर किया था। काँग्रेसी नेताओं का सत्ता सुख भोगने की जल्दी थी। अतः आनन फानन में समझौता कर लिया गया। अंग्रेज नहीं चाहते थे कि दुनियाँ में यह संदेश जाये कि भारतीयों ने अंग्रेजों से अपनी आजादी छीनी है। अतः उन्होंने काँग्रेस के हाथों में भारत की सत्ता सौपी। क्योंकि वे अंग्रेजों की शर्त मानने का राजी थे। इलहावाद के अलफ्रेड पार्क में शहीद चन्द्रशेखर आजाद को घेरने वाले कोतवाल को उत्तर प्रदेश के पुलिस कमान सौपना उन्ही शर्तों में से एक शर्त थी। इस संबंध में आप स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी के आलेख पाढ़िये या उनके भाषण सुनिये। मेरा मानना है कि यह आधी अधूरी आजादी थी, यदि सच कहा जाये तो काँग्रेस और अंग्रेजों के मध्य सत्ता हस्तान्तरण का एक समझौता था। फिर भी आधी अधूरी आजादी की मुबारकबाद……

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

भाई तेजवानी जी आपके आकलन से लगता है की यह आन्दोलन ऐसा ही था जैसे की किसी संतानोत्त्पन्न करने में असमर्थ स्त्री/पुरुष ने किसी किराये की कोख को उधार लिया और अपना मंतव्य पूरा कर लिया जैसा की वीपक्षी पार्टी ने भी इसी विषय पर बहुत व्यापक आन्दोलन किया था परन्तु उसका परिणाम कुछ नहीं निकला इस लिए मुझे ऐसा लगता है ? क्योंकि अन्ना की क्रेडिबिल्टी कहीं बहुत अधिक थी राजनितिक नेताओं की तुलना में इस लिए केवल जनता को मोबिलाइज करने के लिए ही यह सब किया गया है अन्यथा आन्दोलन को एक्सट्रीम पर लाकर मरने जीने और बलिदान की रत लगाने के बाद अचनाक समाप्त कर देना इतना ही नहीं टीम के अस्तित्व को समाप्त करने का क्या मकसद हो सकता हा यही न की काम समाप्त ठेका ख़त्म ? धन्यवाद.

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राजनीति में आने की बात पर अन्ना जी एवं उनकी टीम पर इतना हाय तौबा क्यों...     जागरूगता पैदा करने के लिये इतनी तपस्या के  बाद अब भारत की जनता के हाथ में ही इस आन्दोलन की कमान सौंप दी गयी है जिसके लिये ये आन्दोलन है। अन्ना या केजरीवाल ने  अपने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये ये आन्दोलन नहीं चलाया था। यदि ये आन्दोलन राजनीति में आने के बाद असफल होता है तो ये अन्ना या केजरीवाल की असफलता नहीं होगी बल्कि इससे यही सिद्ध होगा कि भारत की जनता कितनी परिपक्व है या अपरिपक्व।     कुछ बुद्धिजीवी तो इस आन्दोलन को कुछ लोगों की सफलता - असफलता से जोड़कर ऐसे मजे लेकर देख रहे हैं जैसे ये कोई क्रिकेट मैच हो और उनका हित इससे जुड़ा हुआ न हो, या जैसे वे विदेशी पत्रकार हों। यदि अन्ना जी ने इस आन्दोलन को धक्का दिया है तो इसे आगे बढ़ाने के लिये ही। अन्ना जी एवं उनकी टीम मे और आत्मविश्वास आ गया है इसी लिये इन लोगों ने अपनी मुहिम को और कठिन मुकाबले के लिये तैयार कर रहे हैं जिनमें सभी जनता की भागेदारी और आसान हो गयी है।

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टीम अन्ना ने भारतीयों को भ्रमित किया है.........टीम अन्ना ने निरंतर दो वर्षों से पुरे देश को भ्रमित किया है........जिस तरह अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति के बाद क्रांति की अग्नि को ठण्ड करने के लिए कांग्रेस बनायीं थी.......ठीक उसी तरह कांग्रेस ने भारत स्वाभिमान आन्दोलन से भारतीयों को दूर रखने के लिए हमारी क्रांति से डरकर टीम अन्ना को जन्म दिया...........और उनका उद्देश्य सफल भी रहा जिस तरह देश गाँधीवादी और क्रांतिकारियों मैं बंटा था उसी तरह आज टीम अन्ना और स्वदेशी भारत की चाहत रखने वाले भारत स्वाभिमानियों मैं बंटा है........मेरा सभी देशवाशियों से अनुरोध है टीम अन्ना से सावधान रहें........ मैं यह तर्क ऐसे ही नहीं दे रहा हूँ............आप स्थिति पर स्वयं शोध करें..........प्रत्यक्ष रूप से भारत स्वाभिमान आन्दोलन भारत स्वाभिमान यात्रा के रूप मैं स्वामी जी और पूज्यनीय राजीव दीक्षित के नेतृत्व में 14 novemver 2010 को जंतर मंतर पर प्रारंभ हुआ.........आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर पहुँच ही रहा था कि अन्ना ने अप्रैल में जन्लोकपाल के लिए आन्दोलन करना प्रारंभ कर दिया..........शहरी जनता भारत स्वाभिमान आन्दोलन से पूर्णत: अपरिचित थी और अन्ना के आन्दोलन ने उन्हें भारत स्वाभिमान के विषय में कभी जानने का अवसर ही नहीं दिया........और आज भी पढ़े लिखे लोग हमारे आन्दोलन से अपरिचित हैं और अंग्रेजी संस्कृति को अपनाने के कारण स्वामी जी कि वेश भूषा के कारण उन्हें नकारते हैं.............मेरा सभी भारतीयों से यह अनुरोध है कि स्वामी जी और पूज्यनीय राजीव दीक्षित जी के विचारों को जाने..........हमारे सम्पूर्ण स्वदेशी आन्दोलन का अंग बने...........100% राष्ट्रवादी चिन्तन, 100% विदेशी कम्पनियों का बहिष्कार व स्वदेशी को आत्मसात करके, देशभक्त लोगों को 100% संगठित करना तथा 100% योगमय भारत का निर्माण कर स्वस्थ, समृद्ध , संस्कारवान भारत बनाना – यही है “भारत स्वाभिमान” का अभियान । हम संपूर्ण राष्ट्रवादी शक्तियों को संगठित कर देश में एक नई आजादी, नई व्यवस्था एवं नया परिवर्तन लायेंगे और भारत को विश्व की सर्वोच्च महाशक्ति बनायेंगे। यह हमारी दृढ संकल्पना है…….! एक स्वस्थ, समृद्ध एवं संस्कारवान् भारत बनाने का संकल्प लें……. ऐतिहासिक निर्णायक आन्दोलन……..9 अगस्त दिल्ली चलो…….! जय हिंद जय भारत….वन्दे मातरम……!

के द्वारा: pritish1 pritish1

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तेजवानी नमस्कार,   टीम अन्ना ने आन्दोलन को किसी अन्धे कुएं में नहीं ढकेला है बल्कि उसे एक नये ठोस एवं व्यवहारिक धरातल पर ला दिया है। जनता तो अब बहुत खुश है कि अब उसे भी आन्दोलन से जुड़ने का अवसर मिल गया  जो दिल्ली नहीं पहुँच सकती थी, और जिसके अपने शहर मे किये गये आन्दोलन को सरकार के खूटें से  बंधी मीडिया दिखा नही सकती थी। जो किसान  धान की रोपाई,विद्यार्थी  प्रवेश और पढ़ाई, नौकरी करने वाले नौकरी की चिन्ता ,मजदूर  दैनिक मजदूरी की चिन्ता के कारण किसी मैदान या सड़क  पर नहीं जा सके वो अब वोट डाल कर अपना योगदान करेगा और उसके परिणाम को दुनिया की कोई मीडिया दबा नहीं पायेगी।

के द्वारा: Ajay Singh Ajay Singh

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आदरणीय तेजवानी जी सुंदर स्पष्ट लेख के लिए बधाई - वास्तव में संगमा में इतनी हिम्मत थी ही नहीं की वह राष्ट्रपति के चुनाव को लड़ सके - लेकिन यह भी सच है की अपने से बलिष्ठ व्यक्ति से बार बार माफ़ी मांगने वाला व्यक्ति थोड़ी सी ताकत आने पर फिर से ताल ठोकने लगता है वाही हाल अपने संगम जी का भी हुआ इनको ताकत मिली विवादास्पद व्यक्ति सुब्रमण्यम स्वामी से जो हर किसी के फटे में अपनी टांग जरूर अडाते है - लेकिन जो होना तो वह तो पहले से ही स्पष्ट था - लेकिन अपने संगम जी अभी भी ताल ठोंक रहे है की वह सुप्रीम कोर्ट जायंगे - धन्यवाद. कृप्या इसे भी देखें http://sohanpalsingh.jagranjunction.com/2012/07/27/%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b9/

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के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय तेजवानी साहब, नमस्कार! आपने अपनी बात तार्किक अंदाज में रखी है! फिर भी एक सविनय निवेदन भी करना चाहूँगा- टीम अन्ना फिर भी एक टीम है पर बाबा रामदेव स्वनाम धन्य एकमेव हैं. वे ही कहानीकार, संवादलेखक, प्रोडूसर, डिरेक्टर और एक्टर भी हैं ... उनका झुकाव भाजपा की तरफ है जो आज खुद उहापोह में है ... एक नेता पर उनका निर्णय अभी भी असमंजस में है. जनता का विस्वास जीतने में अभीतक नाकामयाब दिख रही है. रही बाबा रामदेव की... हो सकता है वे चुनाव जीतकर प्रधान मंत्री के रूप में स्वीकार भी कर लिए जाएँ ... पर तबतक वर्तमान सरकार उनपर इतने मुक़दमे थोक कर, उन्हें ही कटघरे में खड़ा कर देगी. भारत स्वाभिमान पार्टी में और कितने लोकप्रिय नेता हैं जो चुनाव जीत सकते हैं? अगर आपको ऐसा लगता है तो सपष्ट करने की चेष्टा करें! आभार सहित !

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: tejwanig tejwanig

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के द्वारा: tejwanig tejwanig

आदरणीय तेजवानी जी....सादर... माना ये एक गहरी साज़िश हो सकती है....लेकिन क्या कांग्रेस के सहयोगी दल...ममता...मुलायम सरीखे इस साज़िश को कामयाब होने देंगे....ममता तो माननीय कलाम का नाम सामने लाकर कोलकाता भी रवाना हो चुकी हैं....और शायद प्रणब के नाम पर कभी भी नहीं मानेगी.....और कलाम साहब ने भी वक़्त आने पर फैसला देने का कह दिया है....अब सोनिया.. कलाम साहब के नाम पर कैसे मुहर लगाएगी...क्योंकि वो राजग के समय के राष्ट्रपति रह चुके हैं.....और उनकी क़ाबलियत पर शक भी किसी को नहीं है.....और इस 'झल्लू' मनमोहन ने 8 साल प्रधानमंत्री रह कर क्या कर लिया.....???? और हिंदुस्तान में राष्ट्रपति तो वैसे भी रबड़ की मुहर ही होता है....... सादर....

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh

तेजवानी जी , नमस्कार | यह देश का दुर्भाग्य है कि सत्ता पर काबिज पार्टी भ्रष्टाचार के दलदल में लोट-पोट करती दिख रही है वहीं मुख्य विपक्षी दल में नेता गण सत्ता की सुगंध की मादकता को पा कर बौरा गए है | आज भा . ज .पा . एक आभासी दल हो कर रह गयी है , यहाँ ना तो अनुशाशन है और ना ही संगठन | एक हवाला दलाल पार्टी के पूर्व प्रमुख को ऐ . के. हंगल बता कर नाती - पोते खिलाने की सलाह देता है और दल में कोई इसका विरोध नहीं करता | शायद यदि आज बाजपाई जी भी काम करते होते तो वो भी आउट साइडर हो गए होते | किसी भी संगठन में नेतओ का कद संगठन से बड़ा हो जाना संगठन की अकाल मौत का सूचक है | खेद की बात है कि यह वही दल है जिसे एक समय अनुशाशन और काडर के लिए जाना जाता था |

के द्वारा:

के द्वारा: tejwanig tejwanig

के द्वारा: अजय कुमार झा अजय कुमार झा

एक बात और हम वास्तव में जाग भी रहे या नहीं, यह भी गौर करने लायक होगा। बेशक आमिर के कार्यक्रम से हो रहे असर की सराहना खूब हो रही है। अगर आमिर खान अपने एक टेलीविजन शो के जरिए एक बड़े बदलाव का आश्वासन जनता को दे रहे हैं तो हमें उन्हें समर्थन देना चाहिए। मगर एक तबका ऐसा भी है जो इस सवाल को गंभीरता से उठा रहा है कि क्या ऐसे कार्यक्रम के जरिए कन्या भू्रण हत्या जैसी गंभीर समस्याओं को सुलझाया जा सकता है? यह भी वाकई चिंतनीय है। हमारा जागना तभी सार्थक होगा, जबकि चर्चा भर न करके उस अमल भी करें। श्री तेजवानी जी , नमस्कार ! आमिर खान इस बात में माहिर हैं की किस तरह अपने कार्यक्रम को hype देनी है और इसी के दम पर वो करोड़ों कमा जाते हैं ! अब आमिर खान ही हमें ये बताएगा की हमें कितने बच्चे करने हैं या कैसे करने हैं ? मुझे याद आता है न्यायाधीश श्री काटजू का बयां जिसमें वो अधिकांश भार्तितों को मुर्ख कहते हैं और मुझे लगता है की इसमें कोई दोराय नहीं है ! हम हर चमकती चीज को सोना समझते हैं !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय तेजवानी जी........ आपकी बात कुछ स्पष्ट नहीं हुई....... मैंने अपने कुछ तर्क रखे........ पर उनपर शायद आपने विचार नहीं किया..... क्या अगर बाबा रामदेव मीडिया के बूते ही सही अगर पतंजलि के योग को पुनर्जीवित कर पाये हैं तो इसमे कोई बुराई है....... इस वर्तमान जगत मे जो दिखता है वही बिकता है........ कल तक जो योग भारतियों द्वारा उपेक्षित था उसे बाबा रामदेव ने मीडिया के माध्यम से विश्व के कोने कोने तक प्रसारित कर दिया....... वास्तव मे महत्व इस बात का है की हम संदेश को कितनी गहराई से पकड़ते हैं......... लोग गीता तक को अपने अनुसार व्याख्यादित कर लेते हैं....... पर जो गूढ को समझ गया वो निश्चित ही पार हो जाएगा....... कुछ भी अनुचित यदि कहा हो तो माफी चाहता हूँ.......

के द्वारा: Piyush Kumar Pant Piyush Kumar Pant

आपने कहा है की "बाबा रामदेव को ही लीजिए। उन्होंने कोई नया योग इजाद नहीं किया है। वह हमारी संस्कृति की हजारों साल पुरानी जीवन पद्धति का हिस्सा रहा है। बाबा रामदेव के बेहतर योगी इस देश में हुए हैं और अब भी हैं तथा अपने-अपने आश्रमों में योग सिखा रहे हैं, मगर चूंकि बाबा रामदेव ने इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का सहारा लिया तो ऐसा लगने लगा कि वे दुनिया के पहले योग गुरू हैं।" पर सवाल ये है की क्या बाबा रामदेव के योग से आम आदमी को कोई फर्क पड़ा....... और अगर पड़ा तो क्या बुराई है उनके इस बाजारवाद को अपनाने मे ..... इस संदर्भ मे एक उदाहरण से समझाना चाहता हूँ..... एक आदमी के मुह पर काला रंग लगा था… एक दूसरा आदमी ने उसे बताया की उसके मुह पर कुछ लगा है पर वो माना नही…. तब वो दूसरा आदमी एक शीशा ले आया…..उस शीशे मे स्पष्ट दिख रहा था की उसके मुह पर कालिख लगी है पर पहले आदमी ने कहा की इस शीशे का किनारा टूटा है……. इस शीशे मे धूल जमी है…… पर मुख्य विषय जोकि उसके मुह पर लगी कालिख थी उसे वो अनदेखा कर गया ओर शीशे के दोष निकालने लगा…. वही कुछ हम आमिर के इस शो के साथ कर रहे है… हमें चाहिए की हम सार्थक प्रयास करें........ जहां तक राजस्थान सरकार की बात है तो वो उन दो पत्रकारों के बयान स्पष्ट कर देते हैं की राजस्थान सरकार कितनी गंभीर थी.....

के द्वारा: Piyush Kumar Pant Piyush Kumar Pant

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के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

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तेजवानी जी सादर! महोदय इस अन्ना-काज़मी प्रकरण पर मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ की काज़मी जी अपनी बिरादरी का वही पुराना तकिया कलाम उपयोग में ला रहे हैं की 'फलां लोग मुस्लिम विरोधी हैं' ये विकृत मानसिकता के अलावा कुछ नहीं है. अगर ऐसा था तो अन्ना के साथ वो जुड़े ही क्यों? किसी भी बात को धार्मिक रंग दे कर असत्य को सत्य नहीं बनाया जा सकता. अगर आज कुमार विश्वास को टीम अन्ना से निकला जाता है और वो निकल के ये कहें की - अरे अन्ना ने मुझे निकाल दिया क्योंकि वो हिन्दू विरोधी हैं, तो क्या ये बात सार्वजानिक मंच पर प्रासंगिक होगी? बिलकुल नहीं और होनी चाहिए भी नहीं. हमारी भारतीय व्यवस्था में अगर मुसलमानों को भेदभाव महसूस होता है तो इससे अधिक हास्यापद बात और कुछ नहीं हो सकती.

के द्वारा: कुमार गौरव कुमार गौरव

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के द्वारा: tejwanig tejwanig

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आँखों पर जैसा चस्मा होगा वैसा ही दीखेगा ना........वैसे में मीडिया से अलग हटकर कभी कभी अपना दिमाग भी चला लेता हूँ.....अन्ना और बाबा के आन्दोलनों को गौर से देख पढ़ रहा हूँ......अन्ना का आन्दोलन मीडिया की सहायता से एक देश-हित के मुद्दे को लेकर शुरू हुआ.....बाबा पिछले कई सालों से ऐसे बहुत सारे मुद्दे उठा रहा है, हाँ मीडिया जरूर उसके बारे में सिर्फ सनसनी खबरे ही दिखता है, उसके असली मुद्दे नहीं........!!....अगर आप एक जागरूक नागरिक है तो अपने अभी आँख कान खुले रखेंगे, पूर्वाग्रह और दुराग्रह को छोड़कर सच को स्वीकार करेंगे.......वास्तव में आज देश में मुद्दे क्या है और उनका संपूर्ण समाधान क्या है आप इस वेबसाइट के व्याख्यान सुन पढ़ सकते है.....उम्मीद है आपको अच्छा लगेगा... www.rajivdixit.com

के द्वारा: surendra surendra

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राहुल और अखिलॆश का वाकई कॊई मुकाबला नही है क्यॊकि उत्तर प्रदॆश की जनता नॆ ऎक बार फिर साबित कर दिया है कि राज्य सरकार बनानॆ कॆ लिऎ विश्वास तॊ वॆ अपनॆ क्षॆत्रीय दल पर ही करतॆ है और उसमॆ अखिलॆश बाज़ी मार लॆ गया| अब अगर राहुल कॊ दम दिखाना है तॊ वॊ अपनी कॆन्द्र सरकार कॊ बचाऎ रखकर और अगलॆ लॊकसभा चुनाव मॆ दुबारा सरकार बनाकर दिखाऎ| यही इस दॆश की राजनीति का ऎक नया रूप है जॊ शायद धीरॆ धीरॆ सभी राज्यॊ पर हावी हॊ जाऎगा| राष्ट्रीय स्तर पर काग्रॆस (शायद भाजपा भी) का मरना लगभग आगॆ तय है और उसपर बाबा रामदॆव और अन्ना की दुश्मनी पालकर इस गान्धी परिवार नॆ इस डूबतॆ जहाज़ का छॆद बडाकर दिया है| अब यॆ इस गान्धी परिवार कॊ ही तय करना है कि कॆन्द्र सॆ मिटनॆ कॆ बाद किस राज्य की क्षरण लॆनी है वरना धॊबी कॆ कुत्तॆ बनकर रह जाऎगॆ|

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के द्वारा: chandanrai chandanrai

भाई तेजवानी, जी प्रणाम , यह तो होना ही है और क्या उम्मीद की जा सकती जो लोग दूसरी पार्टियों में लोक तंत्र ढूँढते है शायद उन्हें अपनी पार्टी में वह दिखाई नहीं देता क्योंकि जब पार्टी ही तदर्थ ठेके पर है तो फिर यह तो होगा ही. क्योंकि जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी के सफ़र में जो गार्ड और ड्राइवर थे और जिन्होंने दो सांसद से दो सौ सांसद तक की संख्या करके सरकार बनाई थी वह या तो अब नेपथ्य में चले गए हैं या भेज दिया गए हैं क्योंकि राजनीती से गुरेज करने वाला सांस्कृतिक पितृ संघठन भी नहीं चाहता की इक्कीसवीं सदी की गाडी कोई उन्निसिवी सदी का गार्ड और ड्राइवर चलाये इस लिए भाजापा की मजबूरी है गडकरी जरूरी है ? धन्यबाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

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अगर यह मान भी लिया जाये कि अन्ना के मंच पर ऊंची-ऊंची बातें करने वाले संसद में आ कर पलट गए। ऐसे में यदि यह कहा जाए कि जो लोग भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगाते रहे हैं, वे संसद में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये घडिय़ाली आंसू बहाते नजर आये, और फिर भी लोकपाल बिल कानून बन जाय तो क्या भ्रष्टाचार रूपी राक्षश इस देश से बिदा हो जायगा ? शायद नहीं क्योंकि अन्ना और उनकी मंडली के लोग जिस चश्मे से देखते है उससे केवल सरकार के अन्दर का भ्रष्टाचार और सरकारी मशीनरी द्वारा किया जाने वाला भ्रष्टाचार ही दिखाई देता है जबकि इस देश के व्यापारी और उद्धोगों द्वारा जिस प्रकार का नकली/मिलावटी खाने पीने का सामान बनाया और बेचा जाता है जिससे भावी पीढ़ी का जीवन ही खतरे में पड़ता है, क्या यह भ्रष्टाचार या अपराध नहीं है लेकिन अन्ना और अन्ना कि टीम इनके विरुद्ध कभी कुछ नहीं बोलती और बोले भी क्यों, इन लोगों को अपना आन्दोलन चलाने के लिए जिस पैसे कि जरूरत होती है वह सब यहीं से तो आता है / दूसरी बात यह कि अन्ना कि टीम जब तक गैर राजनितिक लबादा ओढ़े थी तब तक आम जनता उनके साथ थी परन्तु जब टीम और अन्ना ने राजनितिक तौर तरीके अपनाए और एक पार्टी विशेष का विरोध आरम्भ किया तो आम जनता शायद उनसे दूर नजर आई जिसका परिणाम मुम्बई के एमएम आर डी ए मैदान पर साफ़ नजर आया और डर से टीम अन्ना ने अपना अनशन वापस ले लिया यही नहीं अगर जेल भरो आन्दोलन भी चलाते तो वह भी फ्लाप होता, कारण साफ़ है जनता अब राजनीती से त्रस्त हो चुकी है - तीसरा कारण यह भी होसकता है आन्दोलन के फ्लाप होने का कि जनता कि समझ में यह भी डाला गया राजनितिक पार्टियों के द्वारा कि अन्ना कि टीम के लोग भी भ्रष्टाचार से अछूते नहीं है और न ही आन्दोला चलाने वाले दूध के धुले हैं ? चौथा कारण यह भी है यह बात जरूर ध्यान देने कि है कि अन्ना कि टीम को जल्दी किस बात कि है जब इस देश का संविधान किसी नागरिक को यह अधिकार तो देता है कि देश हित के विषयों पर प्रत्येक नागरिक अनशन से लेकर आमरण अनशन तथा व्यापक आन्दोलन धरना प्रदर्शन सब कुछ कर सकता है लेकिन कानून बनाने के कार्य में केवल और केवल विधान सभा और संसद का ही अधिकार है तो इतनी सी बात इतने बड़े आन्दोलन को चलाने वालों कि समझ में क्योंकर नहीं थी. शायद इसका सबसे कारण यही है कि यह सब कार्य टीम अन्ना किसी और बड़ी शक्ति के इशारों पर या निर्देशन के तहत कर रही थी ( देशी या विदेशी ) जैसा मैं पहले भी कह चुका हूँ इस टीम अन्ना के दो महत्त्वपूर्ण सदस्यों के एन जी ओ (कबीर) को एक अमेरिकी संस्था ford foundation से करोड़ों रुपया हर वर्ष इस निर्देश के साथ मिलता है कि यह संस्था भारत , श्रीलंका और नेपाल में "सक्षम-उत्तरदाई-पारदर्शी" सरकार कि स्थापना के लिए कार्य करे (अगर यकींन न हो तो कृपया www.frodfoundation.org/grants/search ) कि साईट पर लोगिंग करे और सच को अपनी आँखों से देखे तो इससे स्पष्ट होता है कि इस आन्दोलन कि दिशानिर्देश कहीं और से संचालित होता है जिस कारण से शायद आम जनता इनसे दूर चली गई / तेजवानी जी आप को धन्यवाद.

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किरन वेदि का खुला है जीवन, इसे जानते सारे नेता। जहाँ रहीं कुछ अलग किया है, कदम उठाये क्रांतिकारी।। जिस पद पर भी काम किया है, अपनी छाप अलग ही छोड़ी। न्याय दिलाया है लोगों को, सच्चाई से रिश्तेदारी।। केजरीवाल को मोह न धन से, उन्हें प्यार है सिर्फ देश से। इनकम वाली छोड़ी सर्विस, यह कुर्वानी नहीं क्या भारी? जन सेवा ओ' देश-भक्ति में, जिसने जीवन झौंक दिया है। जन-जन की आवाज बन गया, छोड़ के सर्विस को सरकारी।। क्रांतिकारियों पर पहले भी, कई झूठे आरोप लगे हैं। नेताओं की इन चालों को, समझ रही है जनता सारी।। उस अन्ना की बात करें क्या, जिसने हमको राह दिखाई। दो शब्दों में ही कह सकते, हम सब अन्ना के आभारी।।

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दद्दू गिरधर जी, अपना तो यही कहना है की " कहो गरीब कैसे निभे बेर केर को संग -- वे डोलत मन आपने उनके फाटत अंग " ये जो अपना बच्चा है न केजरीवाल यह एक असंतुष्ट प्रकृति का जीव है ? व्यक्ति तो जीनियस है लेकिन प्रोपर IAS न बन सका केवल IRS ही रह गया तो मन में अवसाद तो होना ही था इस लिए मोटी मलाई वाला विभाग भी अच्छा नहीं लगा और लग गए समाज सेवा में अपनी जमीन तो केवल इतनी सी ही है की RTI के विषय में लोगो को जागरूक किया करते थे परन्तु उसको चाहिए था एक बड़ा केनवास तो उनको मिल गये श्री श्री बाबु राव अन्ना हजारे जो महाराष्ट्र में अपने गाँव में बहुत ही अच्छा कार्य कर रहे थे और जो सामाजिक कार्य करवाने के लिए हमेशा ही उपवास करते रहते थे. तथा महाराष्ट्र सरकार की नाक में दम किये रहते हैं . अब अपने जन लोकपाल के आन्दोलन की क्षणिक सफलता से इतने अभिभूत हो गए की अन्ना और अपने आपको संसद के ऊपर भी बताने लगे, शायद इनके कानून में ऐसा ही लिखा होगा, शायद हमारे बबुआ अरविन्द को RSS की देश भक्ति और ताकत का एहसास नहीं है तभी तो श्री मोहन भगवत के इस बयान को झुटला रहे है की आर एस एस ने रामलीला मैदान और जंतर मंतर पर आन्दोलन को सफल बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई थी अन्ना ने यहाँ तक कह दिया की रस अन्ना को बदनाम कर रहा है ? "उल्टा चोर कोतवाल को डांटे" तो भैय्या गिरधर जी असल बात तो या है कि इतनी सफलता के बाद इतराना तो पड़ता है जैसे " जो गरीब छोटो बढे तो तेतो इतराय | प्यादे से फर्जी भयो टेड़ो टेड़ो जाय||" तभी वह १२६ वर्ष पुरानी पार्टी के पीछे ही लग गए कि चुनाव में इसे हराना है " अब इनको कौन समझाए कि राजनीती ससुरी है ही इतनी गन्दी कि जो इसमें जाय गा उसे जूते तो खाने ही पड़ेंगे ? आपने एक अच्छा सवाल उठाया है मैंने उत्तर देने कि कोशिस कि है -- धन्यवाद.

के द्वारा:

क्या आपको पता है कि उत्तर भारतियों पर महाराष्ट्र में हो रहे हमलों पर अन्ना हजारे ने राज ठाकरे का समर्थन किया था,और उनकी सामजिक गतिविधियाँ महाराष्ट्र भर में ही सीमित रही,फिर भी चुकी वो भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ हैं,अतः हम उनका समर्थन करते हैं,यह रामदेव का आन्दोलन ही था,जिसके मंच से अन्ना हजारे को राष्ट्रीय पहचान मिली.और रामदेव ने भागने का प्रयास इसलिए किये क्यूंकि पुलिसिया दमन जिस तरह से हो रहा था,और वो रामदेव जी को शांतिपूर्ण ढंग से गिरफ्तार करने के लिए नहीं आई थी,ऐसी परिस्थिति में जान बचाना आन्दोलन कि सफलता के लिए बेहद जरुरी था,सुभाष बोस,हजरत मुहम्मद आदि ने भी विरोधियों से लड़ने के लिए पहले भागकर अपनी जान बचायी थी,और साध्वी ऋतंभरा मंच पर आई तो जरुर थी,लेकिन क्या उन्होंने कोई भड़काऊ बात की?आप बिकी हुयी मीडिया की बातों में पड़कर रामदेव जी पर ऐसे आरोप नहीं लगा सकते.

के द्वारा: rahulpriyadarshi rahulpriyadarshi

चूँकि गाँधी का आशीर्वाद लेकर धरना /सत्याग्रह /तप करेने का प्रण लेने वाले को अगर स्त्री के कपडे पहन अपने अनुयायियों को अकेला छोड़ जान बचाने के लिए भागना पड़े तो यह सत्याग्रह को किसी भी दशा में कुचलने की मंशा को साफ़ बता देता है गाँधी जी ने कभी भी पलायन नहीं किया या मंच छोड़ कर भागें हो इस लिए पूरा देश धरने प्रदर्शन का मंच तो हो सकता है परन्तु देश को सम्मान पूर्वक चलाने का मंच केवल और केवल संसद ही है लेकिन यह देश का दुर्भाग्य ही है की जब संसद में सब काम संख्या के बल पर होता है और विपक्ष इस मामले में बेबस है इस लिए संसद के बजाय उसे दूसरों को कंधे पर बैठा कर सड़कों पर उतरना पड़ रहा है इस लिए मैं यह कह सकता हूँ की अन्ना से राम देव – बदलाव की आहट! जैसा कुछ नहीं है यह राजनीती का परपंच है इसके अतिरिक्त कुछ नहीं वैसे भी अगर वार्ता लाप के मध्य में ९९ प्रतिशत मांग मन ली गई थी फिर १ प्रतिशत पर गाड़ी क्यों अटकी यह भी तो देश को बताना चाहिए अब चाहे सरकार बताये या फिर बाबा राम देव ही बताएं / की उनको बातें मानने से कौन रोक रहा था /

के द्वारा: s p singh s p singh

ग्रीधर साहब, इस गरीब देश के पास कहा से आया इतना पैसा जो बाबा जैसे लोगो को दान में दिया जय, सही कहा आप ने हल ही में हमारे देश के एक धर्म गुरु श्री सत्य साईं बाबा का निधन हुआ जिनका ट्रस्ट लगभग ५००० करोर का है, और फिर करोरो के ट्रस्ट तो इस गरीब देश में अनगिनत है, जैसे सिरडी साईं बाबा का ट्रस्ट, बालाजी मंदिर ट्रस्ट, और श्री श्री रविशंकर जी का ट्रस्ट, और ऐसे अनगिनत ट्रस्ट है जो करोरो में है तो क्या सभी कला धन ही है,और अगर बाबा अधोग्पतियो और राज्नेतावो की कला धन को उजला करते है तो फिर वे कला धन के खिलाफ में ये अनसन क्यों कर रहे है? और फिर जो लोग सफ़ेद धन वाले मंत्री और सरकार है जिन्होंने इस गरीब देश की गरीब जनता की कलि कमी को 2g स्पेक्ट्रुम घोटाला , कामनवेल्थ खेल घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला, और न जाने कितने घोटालो के जरिये इस देश की जन्तो को उपहार दिए, हजारो तन आनाज सर्जता है और लाखो जनता भूखी रह जाती है जिनके सरकार में आखिर ये लोग इस कालाधन वाले बाबा और इस्नके अनुयायियों को जो सन्ति पूर्ण अपना अनशन कर रहे थे उनपे आधी रात को लाठी क्यों चलते है,? बाबा तो अपने को माफ़ नहीं कर सकते लेकिन क्या आप और आप की ये सफ़ेद धन और देशभक्ति से परिरून लुटेरो की तानाशाह सरकार को इस देश की करोरो जनता माफ़ कर सकेगी? वो भूखी गरीब जनता इन्हें माफ़ करेगी?, माफ़ करेगी वो जनता जिनकी खून पाशिने की कमी को ये घोटालो में तब्दील कर के स्विस बैंक को भर रहे है और अपने ही देश को कंगाल बना रहे है? लेकिन हा आप जैसे बिचार के लोग जरुर इस भ्रस्त , तानाशाह, लुटेरी और अत्याचारी सरकार को जरुर माफ़ कर पाएंगे , लेकिन आप की जमीर नहीं?

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भाई गिरधर तेजवानी जी जैसा की आपका कथन है की बाबा के द्वारा घोषित आय के विषय में आपने उनकी जाँच के लिए समय माँगा है तो मेरा तो केवल इतना कहना है की किसी भी जाँच की जरूरत तो तब होगी जब कोई चोरी की हो जब ऐसा कुछ नहीं है तो बाबा को अपने केवल दो ट्रस्ट की बात करते है १-पतंजलि योग पीठ, २- पतंजलि दिव्या योग मंदिर परन्तु वह अपने तीसरे ट्रस्ट भारत स्वाभिमान ट्रस्ट जिसके अंतर्गत वह आजकल योग के साथ -साथ राजनीती की क्लास भी लेते है कोई बात नहीं करते - बाबा यह भी कहते देखे गए हैं की उनके नाम में कोई बैंक अकाउंट नहीं है उनके नाम में कोई संपत्ति भी नहीं है तो बाबा क्या यह बताएँगे की और कितने संतो के नाम पर संपत्तियां है या उनके बैंक अकाउंट है बाबा अपने आपको को ही भ्रमित कर रहें हैं. अब बाबा से मै भी एक मांग/याचना/अनुरोध/चुनौती कर रहा हूँ की वह जब INDIA TV (LIVE) पर श्री रजत शर्मा को अपने अकाउंट के कागज पब्लिक के सामने दिखा कर चुनौती दे रहें थे किसी भी जाँच लिए तैयार हैं तो वह केवल इतना करे की अपने सारे अकाउंट ( शुरू से अब तक ) अपने तीनो ट्रस्टों के वेब पेज पर ड़ाल दे जो चाहे देख ले इसमें कोई परेशानी भी नहीं है - दूध का दूध और पानी का पाने अपने आप नजर आ जायेगा - हाँ अगर बाबा ऐसा नहीं करते तो जरूर दाल में कुछ नहीं जयादा काला अपने आप नजर आ जायेगा-- वैसे बाबा झूंट भी बहुत सफाई से बोलते है जब उनसे पूंछा गया की आपने स्काट्लेंड में जो टापू खरीदा है उसका पैसा कहाँ से आया तो बाबा ने जवाब में कहा की अंग्रेजो ने हम पर दो सौ साल तक राज किया है हमने अगर अब उनकी छाती पर खूंटा गाड़ दिया है तो किसी को क्या एतराज इस पर खूब तालियाँ बजी - क्या बाबा जनता को यह सन्देश देना चाहते है की कानून की अवहेलना करो --- क्या यह सही जवाब है बाबा बड़ी सफाई से उत्तर गोल कर गए ? अब उन्हें कौन समझाए की कोई भी भारतीय ट्रस्ट वर्तमान कानूनों के होते हुए विदेश में कोई संपत्ति नहीं खरीद सकती इस बात का जवाब आज नहीं तो कल अवश्य ही देना होगा --- एसपी. सिंह, मेरठ

के द्वारा: s p singh s p singh

के द्वारा: tejwanig tejwanig




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